
नई दिल्ली:
अभिनेता से नेता बने और मक्कल निधि मय्यम पार्टी के संस्थापक कमल हासन ने बुधवार को राज्यसभा में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर गंभीर चिंता जताई। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के संयुक्त सत्र में दिए गए अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मतदान के मौलिक अधिकार से जुड़ा हुआ है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
कमल हासन ने कहा कि जिस तरह से SIR के नाम पर मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, वह लोकतंत्र के लिए एक बड़ा ख़तरा है। उन्होंने सवाल उठाया,
“हम वोट डालना चाहते हैं सर, लेकिन आयोग हमारे वोट देने के अधिकार की ही जांच कर रहा है। वर्तनी और पते की मामूली ग़लतियों के कारण लोगों को नोटिस भेजे जा रहे हैं।”
“बिहार ज़िंदा मुर्दों की भूमि बन गया”
SIR प्रक्रिया की आलोचना करते हुए हासन ने बिहार का उदाहरण देते हुए तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बिहार में पुनरीक्षण के दौरान कई ज़िंदा मतदाताओं को मृत घोषित कर दिया गया, जिससे उनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए।
उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा,
“बिहार कई ज़िंदा मुर्दों की भूमि बन गया है और हम नहीं चाहते कि यह बीमारी पूरे देश में फैले।”
कमल हासन ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग इस समस्या को रोकने के बजाय इसे फैलाने में भूमिका निभा रहा है। उन्होंने SIR को “जीवित मृतकों की स्पेल-चेक कहानी” बताते हुए कहा कि भाषाई और वर्तनी की ग़लतियों को अयोग्यता मान लिया जा रहा है, जबकि आधुनिक दुनिया में ऐसी त्रुटियों को स्वीकार किया जाता है।
तमिलनाडु को लेकर चेतावनी
कमल हासन ने चेताया कि अगर यही प्रक्रिया तमिलनाडु तक पहुंची तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
उन्होंने कहा,
“हमें डर है कि काग़ज़ों पर तमिलनाडु में जल्द ही एक करोड़ जीवित मृतक हो सकते हैं। जिनके नाम काटे गए हैं, उन्हें उनका मतदान अधिकार वापस मिलना चाहिए।”
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि मतदाताओं की मदद नहीं की गई, तो चुनावी जीत आधी-अधूरी और अवैध मानी जाएगी। उनके भाषण का विपक्षी सांसदों ने ज़ोरदार मेज़ थपथपाकर स्वागत किया। राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने भाषण के बाद उनसे हाथ मिलाकर समर्थन जताया।
लोकतंत्र जीत से बड़ा है
अपने भाषण में कमल हासन ने कहा कि लोकतंत्र को केवल जीत और हार के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा,
“लोकतंत्र में कोई स्थायी विजेता नहीं होता। कोई भी सरकार अमर नहीं है। लोकतांत्रिक भारत का रथ आगे बढ़ता रहेगा, लेकिन लोगों को कुचलकर नहीं।”
उन्होंने अपनी व्यक्तिगत यात्रा का ज़िक्र करते हुए तमिल इतिहास, भाषा और अधिकारों की रक्षा की बात कही और पूर्व मुख्यमंत्री सी. एन. अन्नादुरई से मिले राजनीतिक संस्कारों को याद किया।
सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी की सीधी लड़ाई
इसी दिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी SIR मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत व्यक्तिगत हैसियत में रिट याचिका दायर करते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल को निशाना बना रहा है।
ममता बनर्जी ने अदालत में कहा कि नामों के अनुवाद और वर्तनी की मामूली ग़लतियों के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा,
“दरवाज़े के पीछे न्याय रो रहा है।”
उन्होंने सवाल उठाया कि जब यह प्रक्रिया 24 साल बाद की जा रही है, तो उसे केवल तीन महीने में पूरा करने की इतनी जल्दी क्यों है। त्योहार और फसल के मौसम में नोटिस जारी करने को उन्होंने जनविरोधी बताया।
“असम क्यों नहीं?”
ममता बनर्जी ने आयोग पर आरोप लगाया कि SIR केवल चुनाव से पहले बंगाल में ही लागू किया गया।
उन्होंने सवाल किया,
“असम क्यों नहीं? पूर्वोत्तर क्यों नहीं?”
सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए मामले की सुनवाई 9 फरवरी के लिए तय कर दी है। मुख्य न्यायाधीश ने आयोग को निर्देश दिया कि वर्तनी जैसी मामूली विसंगतियों पर अधिक संवेदनशीलता बरती जाए।
निष्कर्ष
एक ओर संसद में कमल हासन मतदान अधिकारों पर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं। SIR प्रक्रिया अब केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक और संवैधानिक बहस का केंद्र बन चुकी है।
