
पटना: वर्षों तक देश के बड़े राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति तैयार करने वाले चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अब खुद चुनावी मैदान में हैं। सत्ता के गलियारों में लंबे समय तक ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने वाले प्रशांत किशोर के सामने अब खुद ‘किंग’ बनने की चुनौती है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने पटना की प्रतिष्ठित बांकीपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। लेकिन उनकी यह राह आसान नहीं दिख रही। भाजपा के मजबूत गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर अब मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है, क्योंकि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भी अपना उम्मीदवार मैदान में उतार दिया है।
- राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बांकीपुर की लड़ाई अब केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रह गई है, बल्कि यह भाजपा की परंपरागत पकड़, जन सुराज की राजनीतिक स्वीकार्यता और विपक्षी दलों की रणनीति की भी बड़ी परीक्षा बन गई है।
किंगमेकर से उम्मीदवार तक का सफर
प्रशांत किशोर का नाम भारतीय राजनीति में चुनावी रणनीतिकार के रूप में जाना जाता है। उन्होंने विभिन्न राज्यों में कई राजनीतिक दलों के लिए चुनावी अभियान तैयार किए और कई चुनावी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब पहली बार वे खुद जनता के बीच वोट मांग रहे हैं।
- यही वजह है कि उनकी उम्मीदवारी को सामान्य चुनावी मुकाबले से कहीं अधिक राजनीतिक महत्व दिया जा रहा है। यदि वे जीत हासिल करते हैं तो बिहार की राजनीति में एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में उनकी स्थिति काफी मजबूत हो सकती है।
बांकीपुर क्यों है सबसे कठिन सीट?
पटना शहर का प्रमुख इलाका मानी जाने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट पिछले लगभग तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है। वर्ष 1995 से इस सीट पर भाजपा का दबदबा कायम है।
- इस क्षेत्र में कायस्थ, भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य समुदाय के मतदाताओं की अच्छी संख्या है, जिन्हें भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को लगभग 63 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे। वहीं जन सुराज को करीब पांच प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे।
- इसी कारण राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव आसान नहीं होगा।
राजद की एंट्री से बदल गया पूरा समीकरण
प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी की घोषणा के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि भाजपा को चुनौती देने के लिए विपक्ष किसी साझा रणनीति पर काम कर सकता है। ऐसी भी अटकलें थीं कि कांग्रेस और राजद अप्रत्यक्ष रूप से जन सुराज का समर्थन कर सकते हैं।
- लेकिन इन तमाम चर्चाओं पर विराम लगाते हुए राजद ने बांकीपुर सीट से रेखा गुप्ता को उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस फैसले ने चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।
राजद के मैदान में उतरने से अब विपक्षी वोटों के बंटवारे की संभावना बढ़ गई है। यदि मुस्लिम, यादव और अन्य विपक्ष समर्थक मतदाता अलग-अलग उम्मीदवारों के बीच बंटते हैं, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है।
क्या बदली है प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति?
- इस चुनाव में प्रशांत किशोर अपनी सार्वजनिक छवि को भी नए तरीके से प्रस्तुत करते दिखाई दे रहे हैं।
अक्टूबर 2025 के दौरान एक चुनावी कार्यक्रम में माथे पर लगाया गया तिलक कैमरे के सामने पोंछने को लेकर उनकी आलोचना हुई थी। उस घटना के बाद राजनीतिक विरोधियों ने उन पर कई सवाल उठाए थे।
- करीब 17 महीने बाद उन्होंने पटना के प्रसिद्ध महावीर मंदिर पहुंचकर विधिवत पूजा-अर्चना की। मंदिर में दर्शन के बाद उन्होंने माथे पर त्रिपुंड लगाया और प्रसाद ग्रहण किया।
किन मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे हैं पीके?
प्रशांत किशोर अपनी चुनावी सभाओं में रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, प्रशासनिक सुधार और व्यवस्था परिवर्तन जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं।
- उनकी कोशिश शहरी युवाओं, मध्यम वर्ग, पेशेवर वर्ग और उन मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की है जो पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग विकल्प तलाश रहे हैं।
भाजपा बनाम जन सुराज या मोदी बनाम पीके?
राजनीतिक हलकों में बांकीपुर की लड़ाई को केवल भाजपा और जन सुराज के बीच का मुकाबला नहीं माना जा रहा है। कई विश्लेषक इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की राजनीतिक साख और प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत राजनीतिक स्वीकार्यता के बीच मुकाबले के रूप में भी देख रहे हैं।
- यदि भाजपा अपनी परंपरागत सीट सुरक्षित रखती है तो उसका शहरी आधार और मजबूत माना जाएगा। वहीं यदि प्रशांत किशोर अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, तो यह बिहार की राजनीति में उनके लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।
राजद की रणनीति पर भी उठ रहे सवाल
- राजद के उम्मीदवार उतारने के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी का उद्देश्य भाजपा को सीधे चुनौती देना है या विपक्ष के भीतर उभर रहे नए राजनीतिक विकल्प की गति को सीमित करना।
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि प्रशांत किशोर पहली ही चुनावी लड़ाई में बड़ी जीत दर्ज कर लेते हैं, तो वे बिहार की विपक्षी राजनीति में एक मजबूत वैकल्पिक चेहरा बन सकते हैं। इससे भविष्य में विपक्ष के नेतृत्व को लेकर नई राजनीतिक परिस्थितियां बन सकती हैं।
- हालांकि यह केवल राजनीतिक विश्लेषण है। राजद की ओर से इस संबंध में ऐसा कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है कि उसका उद्देश्य किसी विशेष नेता को रोकना है।
अब किस पर टिकी हैं सबकी निगाहें?
बांकीपुर विधानसभा सीट का चुनाव अब पूरे बिहार की सबसे चर्चित सीटों में शामिल हो चुका है। भाजपा अपनी परंपरागत पकड़ बनाए रखने की कोशिश करेगी, जबकि जन सुराज इस सीट के जरिए अपनी राजनीतिक ताकत साबित करना चाहेगा। दूसरी ओर राजद भी अपने सामाजिक आधार को मजबूत बनाए रखने के लिए पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या प्रशांत किशोर पहली बार चुनाव लड़ते हुए भाजपा के मजबूत गढ़ में सेंध लगा पाते हैं या फिर विपक्षी वोटों का बिखराव भाजपा की राह आसान बना देता है।
