
- जहानाबाद की एक माँ का सपना था अपनी बेटी को डॉक्टर बनाने का। उसने अपनी खून-पसीने की कमाई जोड़कर बेटी को पटना भेजा ताकि वो NEET की परीक्षा पास कर सके। लेकिन किसे पता था कि पटना की उन्हीं गलियों से एक दिन उस मासूम की लाश निकलेगी।
- महीनों बीत गए, लेकिन इंसाफ की फाइल अब भी अधूरी है। आज पटना की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। इनकम टैक्स गोलंबर से लेकर CBI कार्यालय तक गूँजती ये चीखें सिस्टम से सवाल पूछ रही हैं— “आखिर और कितनी तारीखें चाहिए?”
कहते हैं बेटियाँ घर की रौनक होती हैं, माता-पिता की उम्मीदों का आसमान होती हैं। जहानाबाद की उस माँ ने भी अपनी आँखों में एक सपना सजाया था— सपना अपनी बेटी को डॉक्टर बनते देखने का। उसने अपनी खून-पसीने की कमाई जोड़ी और बेटी को पटना भेजा ताकि वो ‘नीट’ (NEET) की परीक्षा पास कर सके। लेकिन किसे पता था कि पटना की उन्हीं गलियों से एक दिन बेटी की लाश निकलेगी और वो सपना हमेशा के लिए एक डरावना सच बन जाएगा। तक के
आज पटना की सड़कें गवाह बनीं उस चीख की, जो महीनों से बंद कमरों में दब रही थी। इनकम टैक्स गोलंबर से शुरू हुआ यह जनसैलाब जब CBI कार्यालय पहुँचा, तो मानों पूरा बिहार पूछ रहा था— “आखिर और कितनी तारीखें चाहिए?”महीनों बीत गए… तारीखें बदल गईं, मौसम बदल गए, लेकिन नहीं बदली तो उस माँ की बदहाली और इंसाफ की वो अधूरी फाइल। आज जब वो माँ जहानाबाद से चलकर पटना की तपती सड़कों पर उतरी, तो उनकी आँखों के आँसू सूख चुके थे, लेकिन कलेजे में इंसाफ की आग आज भी वैसी ही धधक रही है।सवाल सिर्फ एक बेटी का नहीं है, सवाल उन हजारों बेटियों का है जो छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर इन हॉस्टलों और पीजी (PG) में रहती हैं। आज हम पूछते हैं— क्या हमारी बेटियाँ सुरक्षित हैं? क्यों एक संदिग्ध मौत को दबाने की कोशिश की जाती है? क्यों स्थानीय पुलिस की जांच पर से भरोसा उठ जाता है कि लोगों को CBI के दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं?
परिजनों का आरोप है कि रसूखदारों को बचाने के लिए सच का गला घोंटा जा रहा है। अगर यह सच नहीं है, तो अब तक कातिल सलाखों के पीछे क्यों नहीं हैं? क्यों एक बेबस माँ को इंसाफ के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं?इंसाफ में देरी, दरअसल इंसाफ का कत्ल है। ये छात्र जो आज सड़कों पर हैं, ये सिर्फ प्रदर्शन नहीं कर रहे, ये इस सिस्टम को आइना दिखा रहे हैं। ये बता रहे हैं कि जब तक उस बेटी को न्याय नहीं मिलता, जब तक उसकी मौत का सच सामने नहीं आता, तब तक ये आंदोलन थमेगा नहीं। प्रशासन कान खोलकर सुन ले— यह भीड़ सिर्फ शोर नहीं है, यह उस आक्रोश की चिंगारी है जो व्यवस्था को बदलने की ताकत रखती है।आज हम अपने इस मंच से सवाल पूछते हैं उन हुक्मरानों से, जो सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करते हैं। कब तक हम अपनी बेटियों की अर्थियों पर न्याय की राजनीति करेंगे? जहानाबाद की उस माँ को उसकी बेटी तो वापस नहीं मिल सकती, लेकिन क्या उसे ये जानने का भी हक नहीं कि उसकी लाडली के साथ क्या हुआ था?
हम चुप नहीं बैठेंगे। जब तक जांच निष्पक्ष नहीं होती, जब तक CBI इस मामले की तह तक नहीं पहुँचती, तब तक हम उस माँ की आवाज़ बनकर सवाल पूछते रहेंगे। क्योंकि अगर आज हम खामोश रहे, तो कल किसी और माँ की गोदी सूनी होगी। फिलहाल के लिए इतना ही हमारी नजर खबर पर लगातार बने रहेगी तब
