
पटना: बिहार की राजनीति में मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह की मुश्किलें लगातार बढ़ती नजर आ रही हैं। जेडीयू के एमएलसी उम्मीदवार नीरज कुमार के विरोध के बीच अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया। इसके बाद नीलम देवी को बीस सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति से हटाने और सरकारी आवास खाली करने का निर्देश दिए जाने से राजनीतिक हलचल और तेज हो गई है। अब अनंत सिंह के लिए अगली बड़ी चुनौती सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई है, जहां दुलारचंद यादव हत्याकांड में पटना हाईकोर्ट से मिली जमानत को रद्द करने की मांग की गई है।
30 अक्टूबर को होने वाली इस सुनवाई पर बिहार की सियासत से जुड़े लोगों की निगाहें टिकी हैं। इसी दिन दुलारचंद यादव की पहली बरसी भी है। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव के दौरान हुई उनकी हत्या के मामले में अनंत सिंह की जमानत को चुनौती दी गई है। ऐसे में अदालत का रुख उनके कानूनी और राजनीतिक भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जेडीयू से निष्कासन के बाद बढ़ीं मुश्किलें
अनंत सिंह और नीलम देवी के खिलाफ बीते कुछ दिनों में लगातार कार्रवाई हुई है। रविवार शाम जेडीयू ने दोनों को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद सोमवार को नीलम देवी को बीस सूत्री समिति से भी हटा दिया गया। इसी क्रम में उन्हें सरकारी बंगला खाली करने का आदेश भी जारी किया गया।
इन घटनाक्रमों ने बिहार की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। कभी मोकामा की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले अनंत सिंह अब एक साथ राजनीतिक और कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हालांकि, उनके भविष्य की दिशा काफी हद तक दुलारचंद यादव हत्याकांड में चल रही न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
क्या है दुलारचंद यादव हत्याकांड?
यह मामला वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान सामने आया था। उस समय अनंत सिंह जेडीयू के टिकट पर मोकामा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे थे। दूसरी ओर, जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के समर्थन में दुलारचंद यादव चुनाव प्रचार कर रहे थे।
चुनाव प्रचार के दौरान दोनों पक्षों के समर्थकों के काफिले आमने-सामने आ गए थे। इसी दौरान हुई हिंसक घटना में दुलारचंद यादव की मौत हो गई। इस मामले में पुलिस ने अनंत सिंह को गिरफ्तार किया था, जिसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया।
जेल में रहने के बावजूद अनंत सिंह ने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की। बाद में मार्च 2026 में पटना हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद वह जेल से बाहर आ गए। हालांकि, उनकी रिहाई को दुलारचंद यादव के पोते नीरज कुमार ने चुनौती दी और जमानत रद्द करने की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए।
सुप्रीम कोर्ट में जमानत रद्द करने की मांग
नीरज कुमार की याचिका में अनंत सिंह को मिली जमानत पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि पटना हाईकोर्ट ने जमानत देते समय अनंत सिंह के आपराधिक इतिहास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
याचिका में मांग की गई है कि हाईकोर्ट के जमानत आदेश को रद्द किया जाए और अनंत सिंह को दोबारा जेल भेजा जाए। अब सुप्रीम कोर्ट में 30 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई के दौरान इस मामले के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया जाएगा।
हालांकि, जमानत रद्द होगी या बरकरार रहेगी, इसका निर्णय अदालत ही करेगी। फिलहाल सुनवाई से पहले किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
बिहार सरकार के हलफनामे से बढ़ सकती है कानूनी चुनौती
इस मामले में बिहार सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामा भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार ने 24 अक्टूबर को अपना हलफनामा दाखिल किया था।
हलफनामे में पुलिस जांच और वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में हुई जांच प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा गया है कि अनंत सिंह और अन्य आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए गए हैं। इसी मामले में जनवरी 2026 में अनंत सिंह के अलावा मणिकांत ठाकुर और रंजीत राम के खिलाफ भी आरोपपत्र दाखिल किए जाने की बात कही गई है।
सरकार के इस रुख के बाद सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई और अहम हो गई है। हालांकि, किसी आरोप का प्रथम दृष्टया सही पाया जाना दोष सिद्ध होने के समान नहीं है। मामले में अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।
अनंत सिंह के आपराधिक इतिहास का भी उठा मुद्दा
जमानत रद्द करने की मांग वाली याचिका में अनंत सिंह के आपराधिक इतिहास का भी उल्लेख किया गया है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, उनके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, रंगदारी और आर्म्स एक्ट समेत विभिन्न गंभीर आरोपों से जुड़े कुल 62 मामले दर्ज होने की बात कही गई है।
याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर उनकी जमानत पर पुनर्विचार करने की मांग की है। दूसरी ओर, इन मामलों में दर्ज आरोपों और न्यायालयों में उनके कानूनी परिणामों के बीच अंतर करना जरूरी है। आपराधिक मामलों की संख्या अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करती।
30 अक्टूबर पर टिकीं सबकी निगाहें
अनंत सिंह के लिए 30 अक्टूबर का दिन महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। एक तरफ जेडीयू से निष्कासन और सरकारी सुविधाओं से जुड़े घटनाक्रम ने उनकी राजनीतिक स्थिति को चर्चा में ला दिया है, तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में जमानत पर होने वाली सुनवाई उनकी कानूनी स्थिति के लिहाज से अहम है।
दुलारचंद यादव के परिवार की ओर से न्याय की मांग के बीच अब सबकी निगाहें शीर्ष अदालत पर हैं। अदालत जमानत रद्द करने की याचिका पर क्या रुख अपनाती है, यह सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगा।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अनंत सिंह को दोबारा जेल जाना पड़ेगा या उनकी जमानत बरकरार रहेगी। इतना जरूर है कि 30 अक्टूबर की सुनवाई मोकामा की राजनीति और इस चर्चित हत्याकांड, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण बनी हुई है।
