
नई दिल्ली: सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। इसी बीच एक यूजर, प्रफुल गर्ग, का वीडियो भी सोशल मीडिया पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। वीडियो में उन्होंने सुझाव दिया है कि आंदोलन का नाम ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ की जगह ‘आरक्षण सुधार आंदोलन’ रखा जाए। उनका कहना है कि आरक्षण पूरी तरह समाप्त करने की मांग व्यावहारिक नहीं है, इसलिए आंदोलन का फोकस व्यवस्था में सुधार और स्पष्ट मांगों पर होना चाहिए।
प्रफुल गर्ग ने बताया कि यह इस विषय पर उनका दूसरा वीडियो है। उन्होंने आंदोलन का समर्थन करने वालों से अपील की कि सभी लोग अलग-अलग मांगें रखने के बजाय एक समान एजेंडे के साथ आगे बढ़ें। उनके अनुसार, किसी भी आंदोलन के प्रभावी होने के लिए उसका एक स्पष्ट लिखित मैनिफेस्टो होना जरूरी है, ताकि सभी समर्थक एक जैसी मांगों को सार्वजनिक रूप से दोहराएं।
‘आरक्षण हटाओ’ की जगह ‘आरक्षण सुधार आंदोलन’ का सुझाव
वीडियो में प्रफुल गर्ग ने कहा कि ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ नाम काफी आक्रामक प्रतीत होता है और इससे यह संदेश जाता है कि पूरी आरक्षण व्यवस्था समाप्त करने की मांग की जा रही है। उन्होंने सुझाव दिया कि इसका नाम ‘आरक्षण सुधार आंदोलन’ रखा जाए, जिससे यह स्पष्ट हो कि उद्देश्य व्यवस्था में सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करना है।
उन्होंने यह भी कहा कि ‘आरक्षण हटाओ’ या ‘जाति हटाओ’ जैसे नारे सुनने में प्रभावी लग सकते हैं, लेकिन इन्हें व्यवहारिक रूप से लागू करना आसान नहीं है। उनके मुताबिक, सरकारें राजनीतिक कारणों से आरक्षण पूरी तरह समाप्त नहीं करेंगी और केवल नारों से जाति आधारित पहचान भी खत्म नहीं की जा सकती। इसलिए आंदोलन को ऐसे सुधारों पर केंद्रित होना चाहिए जिन्हें नीतिगत स्तर पर लागू कराया जा सके।
मैनिफेस्टो को बताया जरूरी
प्रफुल गर्ग का कहना है कि किसी भी आंदोलन को लंबे समय तक चलाने के लिए केवल भावनात्मक नारों से काम नहीं चलता। उनके अनुसार, आंदोलन के पास एक लिखित घोषणापत्र होना चाहिए, जिसमें उसकी सभी प्रमुख मांगें स्पष्ट रूप से दर्ज हों।
उन्होंने कहा कि यदि समर्थक अलग-अलग मुद्दे उठाएंगे तो आंदोलन का संदेश बिखर जाएगा। कोई आरक्षण पूरी तरह समाप्त करने की बात करेगा, कोई जाति व्यवस्था खत्म करने की और कोई किसी विशेष श्रेणी को निशाना बनाएगा। ऐसे में एकजुटता प्रभावित होगी। उन्होंने सुझाव दिया कि आंदोलन को सीमित लेकिन स्पष्ट मांगों पर केंद्रित रहना चाहिए और सभी समर्थक उन्हीं मांगों को लगातार दोहराएं। उनके अनुसार, बिना मैनिफेस्टो के सोशल मीडिया पर कोई अभियान कुछ समय तक चर्चा में रह सकता है, लेकिन बाद में उसकी गति कम हो सकती है।
SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग
घोषणापत्र के प्रमुख बिंदुओं में प्रफुल गर्ग ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग रखी है। उन्होंने कहा कि ऐसे परिवार, जिन्हें लंबे समय से बेहतर शिक्षा, सरकारी नौकरी और अन्य संसाधनों का लाभ मिल चुका है, उनके मामले की समीक्षा होनी चाहिए।
उनका तर्क है कि यदि किसी परिवार की एक पीढ़ी आरक्षण का लाभ लेकर सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुकी है, तो अगली पीढ़ी को उसी प्रकार लाभ जारी रखने की समीक्षा की जानी चाहिए। उनके अनुसार, आरक्षण का लाभ उन परिवारों तक अधिक पहुंचना चाहिए जो अब भी शिक्षा और रोजगार के अवसरों से वंचित हैं।
टीना डाबी का उदाहरण देकर उठाया सवाल
प्रफुल गर्ग ने अपने वीडियो में आईएएस अधिकारी टीना डाबी का उदाहरण भी दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी उम्मीदवार के माता-पिता उच्च सरकारी पदों पर रहे हों और उम्मीदवार ने प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की हो, तो क्या अगली पीढ़ी को भी उसी प्रकार आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।
वीडियो में उन्होंने यह भी दावा किया कि टीना डाबी ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की प्रारंभिक परीक्षा में आरक्षण का लाभ लिया था। हालांकि, इस दावे के समर्थन में उन्होंने कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया। उनका कहना था कि चर्चा किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि आरक्षण नीति के स्तर पर होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या एक ही परिवार की दूसरी या तीसरी पीढ़ी को लगातार समान लाभ मिलना चाहिए या यह लाभ उसी वर्ग के अधिक जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचना चाहिए।
न्यूनतम अंक तय करने का सुझाव
घोषणापत्र में एक अन्य प्रस्ताव आरक्षण के साथ न्यूनतम योग्यता मानक तय करने का भी है। प्रफुल गर्ग ने दावा किया कि कुछ शैक्षणिक प्रवेश प्रक्रियाओं में बहुत कम या शून्य अंक पर भी प्रवेश दिए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, पीएचडी और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के साथ एक न्यूनतम क्वालिफाइंग बेंचमार्क होना चाहिए। उनका मानना है कि आरक्षण अवसर उपलब्ध कराने का माध्यम होना चाहिए, लेकिन बुनियादी योग्यता मानकों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि तय न्यूनतम अंक से नीचे रहने वाले उम्मीदवारों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। हालांकि, अलग-अलग परीक्षाओं और संस्थानों में पात्रता, कटऑफ और चयन के नियम अलग होते हैं। ऐसे में शून्य या बेहद कम अंकों से जुड़े किसी भी दावे का मूल्यांकन संबंधित परीक्षा के आधिकारिक नियमों और परिणामों के आधार पर ही किया जा सकता है।
OBC और SC-ST आरक्षण के उपयोग की सीमा तय करने का प्रस्ताव
प्रफुल गर्ग ने सुझाव दिया कि आरक्षण के उपयोग की संख्या भी सीमित होनी चाहिए।
उन्होंने प्रस्ताव रखा कि OBC उम्मीदवार को स्नातक, स्नातकोत्तर, पीएचडी और सरकारी नौकरी सहित सभी चरणों में कुल मिलाकर केवल एक बार आरक्षण का लाभ मिले। वहीं SC-ST उम्मीदवारों को अधिकतम दो बार आरक्षण का लाभ दिया जाए।
उनका तर्क है कि इससे आरक्षण का लाभ अधिक लोगों तक पहुंच सकेगा। हालांकि, यह प्रस्ताव वर्तमान संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था से अलग है और इसे लागू करने के लिए व्यापक कानूनी समीक्षा, आंकड़ों के अध्ययन तथा संभावित विधायी बदलाव की आवश्यकता होगी।
सामान्य सीटों पर चयन को लेकर भी उठाया सवाल
घोषणापत्र में यह भी सुझाव दिया गया है कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को केवल आरक्षित श्रेणी के तहत ही चयनित किया जाए और उन्हें सामान्य वर्ग की सीटों पर चयन न दिया जाए।
वर्तमान व्यवस्था में यदि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार सामान्य मेरिट के आधार पर चयनित होता है, तो उसे अनारक्षित सीट पर स्थान दिया जाता है और उसकी आरक्षित सीट उसी वर्ग के किसी अन्य उम्मीदवार को मिल जाती है। प्रफुल गर्ग ने इस व्यवस्था में बदलाव की मांग की है।
हालांकि, इस प्रस्ताव पर कानूनी और संवैधानिक स्तर पर बहस की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि सामान्य मेरिट से चयनित उम्मीदवार को केवल उसकी श्रेणी के आधार पर अनारक्षित सीट से बाहर रखने का प्रश्न समान अवसर के सिद्धांत से जुड़ सकता है।
बचा हुआ आरक्षण EWS, दिव्यांग और पूर्व सैनिकों को देने का सुझाव
प्रफुल गर्ग ने यह भी कहा कि यदि समीक्षा के बाद SC, ST या OBC आरक्षण के प्रतिशत में कमी होती है, तो उस हिस्से को समाप्त करने के बजाय आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), दिव्यांग व्यक्तियों तथा पूर्व सैनिकों या उनके परिवारों को दिया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि उन्हें जरूरतमंद लोगों को सहायता दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। उनकी आपत्ति केवल इस बात को लेकर है कि वर्तमान व्यवस्था की नियमित समीक्षा नहीं होती और आरक्षण का लाभ बार-बार उन्हीं परिवारों तक पहुंचता रहता है।
हर 10 साल में समीक्षा की मांग
घोषणापत्र में आरक्षण नीति की प्रत्येक 10 वर्ष में व्यापक समीक्षा कराने का भी प्रस्ताव रखा गया है।
प्रस्ताव के अनुसार समीक्षा के दौरान यह देखा जाए कि किन समुदायों को कितना लाभ मिला, किन क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व बढ़ा, कौन से परिवार बार-बार लाभ ले रहे हैं, किन समूहों तक आरक्षण का लाभ अभी भी नहीं पहुंच पाया और किन श्रेणियों के प्रतिशत में बदलाव की आवश्यकता है।
इसके साथ ही समीक्षा के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाने की भी मांग की गई है, ताकि आरक्षण नीति से जुड़े निर्णय वास्तविक आंकड़ों के आधार पर लिए जा सकें।
